Connect with us

कोरोना

जलवायु परिवर्तन को लेकर 220 पत्रिकाओं ने दी चेतावनी- ‘कोरोना महामारी के समाप्त होने का इंतजार नहीं कर सकती प्रकृति’

नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया के प्रधान संपादक पीयूष साहनी ने कहा कि हम आने वाली पीढ़ियों के लिए इसके ऋणी हैं

Published

on

Photo from Unplash
Photo from Unplash

जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनिया की प्रमुख पत्रिकाओं ने वैश्विक नेताओं और दुनियाभर की सरकारों को आगाह किया है कि जलवायु परिवर्तन पर हमें जरूरी काम करना होगा, क्योंकि प्रकृति कोरोना महामारी के खत्म होने का इंतजार नहीं करेगी। नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया और द लैंसेट सहित 220 से अधिक प्रमुख पत्रिकाओं में प्रकाशित एक संपादकीय के अनुसार विश्व के नेताओं को जलवायु परिवर्तन को सीमित करने, जैव विविधता को बहाल करने और स्वास्थ्य की रक्षा करने के लिए तत्काल कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

 

संपादकीय में कहा गया है कि भविष्य में वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने और प्रकृति को बहाल करने के लिए पर्याप्त कार्रवाई करने में विश्व नेताओं की निरंतर विफलता है। संपादकीय के लेखकों ने आगाह किया है कि उत्सर्जन को कम करने और प्रकृति के संरक्षण के लिए हाल के लक्ष्यों का स्वागत है, लेकिन यह पर्याप्त नहीं हैं और अभी तक विश्वसनीय लघु और दीर्घकालिक योजनाओं से मेल नहीं खाते हैं।

 

द लैंसेट के प्रधान संपादक रिचर्ड हॉर्टन ने कहा कि जलवायु संकट पर तत्काल ध्यान देना दुनिया भर में लोगों की भलाई को आगे बढ़ाने के सबसे बड़े अवसरों में एक है। रिचर्ड हॉर्टन ने समझाया कि वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने के लिए अपने कार्यों के लिए राजनीतिक नेताओं को जवाबदेह ठहराने के लिए स्वास्थ्य समुदाय को अपनी आवाज उठाने के लिए और अधिक प्रयास करना चाहिए।

Photo from Unplash

Photo from Unplash

नेशनल मेडिकल जर्नल ऑफ इंडिया के प्रधान संपादक और संपादकीय के सह-लेखकों में से एक पीयूष साहनी ने कहा कि विश्वभर में भीषण मौसम के हालिया उदाहरणों ने हमें यह सोचने पर मजबूर किया है कि जलवायु परिवर्तन बड़ा मुद्दा है। साहनी ने आगे कहा कि ‘हमें अभी कार्य करना चाहिए, कहीं बहुत देर न हो जाए। हम आने वाली पीढ़ियों के लिए इसके ऋणी हैं’।

 

जलवायु परिवर्तन पर यह संपादकीय संयुक्त राष्ट्र महासभा से पहले प्रकाशित किया गया है। जो नवंबर में यूके के ग्लासगो में COP-26 जलवायु सम्मेलन से पहले होने वाली अंतिम अंतर्राष्ट्रीय बैठकों में से एक है। संपादकीय में यह भी कहा गया है कि कि पर्याप्त वैश्विक कार्रवाई तभी हासिल की जा सकती है जब उच्च आय वाले देश बाकी दुनिया का समर्थन करने और अपनी खपत को कम करने के लिए और अधिक प्रयास करें।

Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *