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भारत

हमें कैसा देश चाहिए- ‘विकसित या संपन्न भारत’

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एक फटेहाल भिखारी जब किसी महलनुमा घर के सामने खड़ा होता है तो भिखारी को यह विचार नहीं आता कि वह उस महल का स्वामी बन जाए बल्कि उसे वहाँ से भी दो सूखी रोटी की आशा होती है ताकि उसका पेट भरे क्योंकि वही उसकी मूल आवश्यकता है ठीक उसी प्रकार इस राष्ट्र के आम नागरिक की भी मूल आवश्यकतायें है। इन दिनों समाचार चैनलो से लेकर संसद तक विकसित भारत का मापदंड केवल लंबी सड़के, ऊँची इमारतें और पश्चिमी सभ्यता की चकाचौंध ही है। लेकिन क्या वास्तव में यह सही मापदंड है ?

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भारत की सड़कों में अगर कोई गड्ढ़ा न हो बिजली चौबिसों घण्टें आये तो ये विकसित भारत हो सकता पर संपन्न भारत नहीं क्योंकि जिसके पेट में अन्न का दाना नहीं होगा वो ऐसे विकसित भारत का क्या करेगा जिसमें सुसज्जित सड़के हो पर पेटभर भोजन नहीं। वो नागरिक जिसके बच्चे शिक्षा प्राप्त नही कर सकते उसके लिये कभी ना जाने वाली बिजली भी अंधेरे के समान है।

 

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इसीलिए हमे विकसित से पहले संपन्न राष्ट्र की कामना करनी चाहिए क्योंकि जब राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक भूखा नहीं सोएगा तभी राष्ट्र का विकास अर्थकारी होगा। देखा जाए तो आज भी भारत की एक बड़ी जनसंख्या के बच्चे अच्छी शिक्षा या फिर सामान्य शिक्षा से भी वंचित है। कारण या तो उनके माता-पिता उतने समर्थ नही की वो उनकी शिक्षा का खर्च उठा सके या फिर जो शिक्षा की सुविधा सरकार ने दी वो उन तक कभी ढंग से पहुँची ही नही।

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समाज या राष्ट्र के लोगो का जोर धनवान होने से अधिक संपन्न होने पर होना चाहिये। एक साधारण नागरिक बस अपने सर पर एक छत और अपने परिवार को भरपेट भोजन उपलब्ध कराना चाहता है और साथ ही एक भयमुक्त समाज की कामना करता है जिसमे वो सरलता से रह सके और उसकी संताने अच्छी शिक्षा लेकर अपना एक उचित भविष्य बना सके।

 

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संपन्नता ही विकसित भारत का आधार बन सकती है। विशेषकर जब इस राष्ट्र का प्रत्येक नागरिक भूखा ना सोयें, किसी को बिना छत के ना रहना पड़े सभी बच्चों को, उपर्युक्त शिक्षा प्राप्त हो और उन्हें उनकी मूलभूत सुविधाओं बिना किसी बाधा के मुहैया हो तभी हम विकसित राष्ट्र की कामना कर सकते हैं अन्यथा गरीबी और बेरोजगारी से परेशान लोग इस राष्ट्र में विकसित की गई सड़कों और आधुनिक प्रतिष्ठानों में अपने लिये संघर्ष करते ही नजर आयेंगे और विकसित भारत की आस मे हम संपन्न भारत की आशा भी खो देंगे।

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